2. श्री जगन्नाथ की उत्पत्ति की दिव्य कथा
नीलमाधव से श्री जगन्नाथ तक – राजा इन्द्रद्युम्न, विद्यापति और विश्ववसु की अद्भुत कथा
श्री जगन्नाथ धाम की महिमा केवल उसके विशाल मंदिर, भव्य रथ यात्रा या करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था तक सीमित नहीं है। इसके मूल में एक ऐसी दिव्य कथा है, जिसमें भक्ति, तपस्या, त्याग, विश्वास, ईश्वर की इच्छा और मानव प्रयास—सभी का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
यह कथा हमें बताती है कि भगवान को केवल बाहरी साधनों से प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और समर्पण ही उनके साक्षात्कार का वास्तविक मार्ग है। श्री जगन्नाथ की उत्पत्ति से जुड़ी प्रमुख कथा का उल्लेख विशेष रूप से स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड, ब्रह्म पुराण, नारद पुराण तथा स्थानीय ओड़िया परम्पराओं में मिलता है। यद्यपि विभिन्न ग्रंथों में घटनाओं के वर्णन में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं, किन्तु कथा का मूल भाव समान है।
नीलमाधव की रहस्यमयी उपासना
श्री जगन्नाथ की कथा का प्रारम्भ भगवान जगन्नाथ से नहीं, बल्कि नीलमाधव से होता है। ‘नीलमाधव’ भगवान विष्णु का अत्यन्त प्राचीन और दिव्य स्वरूप माना जाता है। “नील” का अर्थ है गहरा नीला अथवा अनन्त आकाश के समान रंग, जबकि “माधव” भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण के प्रसिद्ध नामों में से एक है। मान्यता है कि प्राचीन काल में घने वनों और पर्वतों के मध्य स्थित एक अत्यंत पवित्र स्थान पर भगवान नीलमाधव स्वयं प्रकट होकर विराजमान थे। यह स्थान सामान्य लोगों के लिए अज्ञात था और केवल एक परम भक्त को ही उनके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त था। वह भक्त थे—विश्ववसु, जो शबर (सवरा) समुदाय के प्रमुख थे। विश्ववसु प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से भगवान नीलमाधव की पूजा करते थे। उनके लिए भगवान किसी राजसी वैभव के नहीं, बल्कि आत्मीय स्नेह और निष्कपट भक्ति के प्रतीक थे। वन से प्राप्त पुष्प, फल, कंद-मूल और स्वच्छ जल ही उनके पूजन का आधार थे।
यहीं से सनातन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश सामने आता है—भगवान के लिए बाहरी वैभव से अधिक शुद्ध हृदय का महत्व है।
मालव देश के राजा इन्द्रद्युम्न
उसी समय मालव देश में एक अत्यंत धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और विष्णुभक्त राजा राज्य करते थे, जिनका नाम था राजा इन्द्रद्युम्न।
राजा इन्द्रद्युम्न केवल एक सफल शासक ही नहीं थे, बल्कि उनका जीवन भगवान विष्णु की भक्ति को समर्पित था। वे प्रतिदिन पूजा, यज्ञ, दान और धर्मकार्य करते थे, किन्तु उनके मन में एक ऐसी अभिलाषा थी जो दिन-प्रतिदिन और प्रबल होती जा रही थी।
वे चाहते थे कि उन्हें भगवान विष्णु के उस दिव्य स्वरूप के दर्शन हों, जो संसार में अद्वितीय और स्वयंभू माना जाता है। कई संतों, ऋषियों और यात्रियों से उन्होंने एक रहस्यमयी देवता नीलमाधव के विषय में सुना था। कहा जाता था कि उनके दर्शन मात्र से मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है और जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। राजा के मन में संकल्प जागा— “जब तक मैं भगवान नीलमाधव के दर्शन नहीं करूँगा, तब तक मुझे वास्तविक शांति प्राप्त नहीं होगी।”
यह केवल एक राजा की इच्छा नहीं थी; यह एक सच्चे भक्त की तीव्र ईश्वर-पिपासा थी।
भगवान के दर्शन की खोज
राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने राजपुरोहितों, विद्वानों और दूतों को चारों दिशाओं में भेजा। उन्होंने आदेश दिया कि जहाँ कहीं भी भगवान नीलमाधव के विषय में कोई सूचना मिले, उसे तुरंत राजमहल तक पहुँचाया जाए। अनेक महीनों तक खोज चलती रही, किन्तु कोई सफलता नहीं मिली। एक दिन राजसभा में एक तपस्वी ब्राह्मण ने आकर बताया कि पूर्व दिशा में समुद्र के निकट स्थित घने वनों के बीच किसी गुप्त स्थान पर भगवान नीलमाधव विराजमान हैं। वहाँ केवल एक शबर भक्त प्रतिदिन उनकी पूजा करता है और उस स्थान का रहस्य किसी को ज्ञात नहीं। यह समाचार सुनते ही राजा इन्द्रद्युम्न का हृदय प्रसन्नता से भर उठा। उन्होंने अपने सबसे विद्वान, धैर्यवान और बुद्धिमान ब्राह्मण विद्यापति को नीलमाधव की खोज के लिए भेजने का निर्णय लिया।
विद्यापति का कठिन अभियान
विद्यापति केवल वेदों के ज्ञाता ही नहीं थे, बल्कि अत्यंत धैर्यवान और विवेकशील भी थे। उन्होंने कई नदियाँ पार कीं, घने जंगलों से होकर यात्रा की, पर्वतों को लाँघा और अनेक ग्रामों में भगवान नीलमाधव के विषय में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया। कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद वे उस वनप्रदेश में पहुँचे जहाँ शबर समुदाय निवास करता था। वहीं उनकी भेंट शबर प्रमुख विश्ववसु से हुई। विश्ववसु अत्यंत सरल, विनम्र और भक्तिमय स्वभाव के थे, किन्तु वे अपने आराध्य भगवान नीलमाधव के स्थान को किसी भी बाहरी व्यक्ति के सामने प्रकट नहीं करना चाहते थे। जब विद्यापति ने उनसे भगवान नीलमाधव के दर्शन कराने का निवेदन किया, तब विश्ववसु ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उनके लिए भगवान का रहस्य किसी राजकीय सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण था।
ललिता और विद्यापति
विश्ववसु की एक पुत्री थी, जिसका नाम ललिता था। कुछ परम्पराओं के अनुसार, विद्यापति और ललिता के बीच परिचय हुआ जो बाद में
विवाह में परिणत हुआ। यह प्रसंग केवल पारिवारिक घटना नहीं माना जाता, बल्कि दो संस्कृतियों—वैदिक परम्परा और वनवासी भक्ति परम्परा—के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है। विवाह के पश्चात् भी विश्ववसु भगवान नीलमाधव का स्थान गुप्त ही रखते थे। किन्तु विद्यापति की सच्ची श्रद्धा और भगवान के दर्शन की तीव्र इच्छा को देखकर अंततः विश्ववसु का हृदय पिघल गया।
उन्होंने एक शर्त रखी— वे विद्यापति को भगवान के दर्शन तो कराएँगे, किन्तु उनकी आँखों पर पट्टी बाँधकर ले जाया जाएगा, ताकि मार्ग का रहस्य किसी को ज्ञात न हो। विद्यापति ने बिना किसी संकोच के यह शर्त स्वीकार कर ली। उनके लिए मार्ग का ज्ञान महत्वपूर्ण नहीं था; उनके लिए भगवान के दर्शन ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य था।
अंधी यात्रा, जागृत बुद्धि
निर्धारित दिन विश्ववसु ने विद्यापति की आँखों पर कपड़ा बाँधा और उन्हें अपने साथ वन के भीतर ले चले। मार्ग अत्यंत दुर्गम था। कहीं ऊँचे-नीचे पर्वत, कहीं घने वृक्ष, कहीं नदी की धारा और कहीं पथरीले रास्ते थे। यद्यपि विद्यापति की आँखें ढकी हुई थीं, किन्तु उनका मन पूर्णतः जाग्रत था। कथा के अनुसार, उन्होंने अपनी कमर में सरसों (राई) के बीज बाँध लिए थे। चलते समय वे धीरे-धीरे उन बीजों को मार्ग में गिराते रहे, ताकि बाद में वर्षा होने पर वे अंकुरित हो जाएँ और उसी मार्ग की पहचान हो सके। यह प्रसंग भारतीय लोकपरम्परा में अत्यंत प्रसिद्ध है। यद्यपि सभी प्राचीन ग्रंथों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी ओड़िशा की लोककथाओं और जनश्रुतियों में यह कथा अत्यंत श्रद्धा से सुनाई जाती है।
यह घटना केवल बुद्धिमत्ता का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह भी सिखाती है कि भक्ति के साथ विवेक का होना भी आवश्यक है।
प्रथम दर्शन – नीलमाधव का अलौकिक स्वरूप
लम्बी यात्रा के बाद जब पट्टी हटाई गई, तब विद्यापति के सामने जो दृश्य था, उसे देखकर वे स्तब्ध रह गए। घने वन के मध्य, दिव्य प्रकाश से आलोकित पवित्र स्थान पर भगवान नीलमाधव विराजमान थे। चारों ओर अद्भुत शांति थी। वातावरण सुगंधित पुष्पों की महक से भरा हुआ था। पक्षियों का मधुर कलरव मानो भगवान की स्तुति कर रहा था। विद्यापति की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने अनुभव किया कि वर्षों की तपस्या और खोज आज पूर्ण हो गई। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े और भाव-विभोर होकर प्रार्थना करने लगे। उसी क्षण उन्हें यह भी अनुभव हुआ कि भगवान किसी विशेष वर्ग या समाज के नहीं हैं। जिस प्रकार एक वनवासी भक्त विश्ववसु को उन्होंने अपना बना लिया, उसी प्रकार वे प्रत्येक सच्चे भक्त के हैं। यही श्री जगन्नाथ परम्परा का मूल संदेश है—ईश्वर के द्वार पर जन्म, जाति, पद, धन और बाहरी पहचान का कोई महत्व नहीं; वहाँ केवल भक्ति का मूल्य है।
भाग–2B : नीलमाधव से श्री जगन्नाथ तक
भगवान का अन्तर्धान, दिव्य दारु का प्राकट्य और श्री जगन्नाथ की मूर्तियों का निर्माण, विद्यापति का लौटना और राजा इन्द्रद्युम्न की उत्कंठा
भगवान नीलमाधव के दिव्य दर्शन के पश्चात् विद्यापति का हृदय अपार आनंद से भर गया। वे समझ चुके थे कि उन्हें केवल किसी दुर्लभ देवस्थान का पता नहीं मिला, बल्कि भगवान के ऐसे स्वरूप का साक्षात्कार हुआ है, जिसकी महिमा का वर्णन शब्दों में संभव नहीं। कुछ समय पश्चात् वे मालव देश लौटे और राजा इन्द्रद्युम्न के समक्ष सम्पूर्ण घटना का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि पूर्व दिशा के घने वन में शबर प्रमुख विश्ववसु अत्यंत गुप्त रूप से भगवान नीलमाधव की पूजा करते हैं। वहाँ का वातावरण दिव्य है और भगवान का तेज अलौकिक है। राजा इन्द्रद्युम्न यह सुनकर भाव-विभोर हो उठे। उनकी आँखों में आँसू आ गए। वर्षों से जिस स्वरूप के दर्शन की लालसा उनके हृदय में थी, अब वह साकार होने वाली थी। उन्होंने तत्काल अपने मंत्रियों, पुरोहितों, सैनिकों और अनेक भक्तों के साथ उस पवित्र स्थान की यात्रा का निर्णय लिया।
सरसों के बीजों का मार्ग
लोकपरम्परा के अनुसार, जब विद्यापति पहली बार विश्ववसु के साथ गए थे, तब उन्होंने मार्ग में सरसों (राई) के बीज गिरा दिए थे। कुछ समय बाद वर्षा हुई और वे बीज अंकुरित होकर छोटे-छोटे पौधों में बदल गए। इन्हीं अंकुरित पौधों के आधार पर राजा इन्द्रद्युम्न की विशाल टोली उस वनप्रदेश तक पहुँच सकी। यह प्रसंग ओड़िशा की लोककथाओं में अत्यंत लोकप्रिय है। यद्यपि सभी प्राचीन पुराणों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी यह कथा भारतीय जनश्रुति में बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का सुंदर प्रतीक मानी जाती है।
भगवान नीलमाधव का अन्तर्धान
राजा इन्द्रद्युम्न अत्यंत श्रद्धा के साथ उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भगवान नीलमाधव विराजमान थे। किन्तु वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो देखा, उससे उनका हृदय टूट गया। भगवान नीलमाधव का दिव्य विग्रह वहाँ नहीं था। विश्ववसु स्वयं भी आश्चर्यचकित थे। जिस स्थान पर वे प्रतिदिन पूजा करते थे, वहाँ भगवान अब अदृश्य हो चुके थे।
राजा इन्द्रद्युम्न अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे भूमि पर बैठकर विलाप करने लगे— “हे प्रभु! क्या मैं आपके दर्शन के योग्य भी नहीं था?” यह प्रसंग केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक संकेत भी है। ईश्वर को केवल बाहरी प्रयासों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे स्वयं जब उचित समय समझते हैं, तभी अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराते हैं।
राजा इन्द्रद्युम्न की कठोर तपस्या
भगवान के अन्तर्धान से दुखी होकर राजा ने राज्य, वैभव और सुख-सुविधाओं की चिंता छोड़ दी। उन्होंने वहीं भगवान विष्णु की कठोर आराधना आरम्भ कर दी। यज्ञ किए, व्रत रखे, जप किया और निरंतर भगवान से प्रार्थना करते रहे कि वे पुनः दर्शन दें। राजा की तपस्या केवल व्यक्तिगत इच्छा के लिए नहीं थी। वे चाहते थे कि ऐसा दिव्य स्वरूप स्थापित हो, जिसके दर्शन सम्पूर्ण मानव समाज कर सके। उनकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए।
भगवान का दिव्य आदेश
स्वप्न में भगवान ने राजा इन्द्रद्युम्न से कहा— “हे राजन! जिस स्वरूप की तुम खोज कर रहे हो, वह अब उस रूप में उपलब्ध नहीं होगा। किंतु निराश मत हो। उचित समय आने पर समुद्र से एक दिव्य दारु (पवित्र काष्ठ) प्रकट होगा। उसी दारु से मेरे नए स्वरूप का निर्माण कराना। मैं उसी विग्रह में सदैव निवास करूँगा।”
राजा की आँख खुली तो उनका मन आशा और उत्साह से भर गया। उन्होंने इस दिव्य आदेश को अपने जीवन का परम लक्ष्य बना लिया।
समुद्र से दिव्य दारु का प्राकट्य
कुछ समय बाद समुद्र तट पर एक विशाल पवित्र लकड़ी का लट्ठा (दारु) तैरता हुआ दिखाई दिया। यह साधारण लकड़ी नहीं थी।
कथा के अनुसार उस दारु पर शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे दिव्य चिह्न अंकित थे। इन चिह्नों को देखकर विद्वानों और ऋषियों ने घोषणा की कि यही भगवान द्वारा बताई गई दिव्य दारु है। राजा इन्द्रद्युम्न ने अनेक हाथियों, सैनिकों और सेवकों की सहायता से उस लकड़ी को उठाने का प्रयास कराया, किन्तु वह तनिक भी नहीं हिली। तब आकाशवाणी हुई— “इस दारु को बल से नहीं, भक्ति से उठाया जाएगा।”
राजा ने विश्ववसु और विद्यापति दोनों को बुलाया। जब दोनों ने मिलकर भगवान का स्मरण किया और श्रद्धापूर्वक दारु को स्पर्श किया, तब वह सहज ही उठ गई। यह घटना सनातन धर्म का अत्यंत गहरा संदेश देती है कि जहाँ शक्ति असफल हो जाती है, वहाँ श्रद्धा और भक्ति सफलता का मार्ग खोल देती है।
रहस्यमयी वृद्ध बढ़ई
अब प्रश्न था कि इस दिव्य दारु से भगवान की मूर्तियाँ कौन बनाएगा?
इसी समय एक वृद्ध बढ़ई राजसभा में उपस्थित हुआ। उसने राजा से कहा— “यदि आप मुझे एकांत में कार्य करने दें और निश्चित समय तक कोई भी मेरे कार्यस्थल का द्वार न खोले, तो मैं इन दिव्य विग्रहों का निर्माण कर दूँगा।”
राजा ने उसका परिचय पूछा। वृद्ध ने केवल इतना कहा— “मुझे एक साधारण शिल्पी समझिए।” कई परम्पराओं में यह वृद्ध स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा माने गए हैं, जबकि कुछ परम्पराओं में उन्हें स्वयं भगवान का ही दिव्य रूप माना गया है। राजा ने उनकी शर्त स्वीकार कर ली।
इक्कीस दिन का रहस्य
वृद्ध बढ़ई ने स्वयं को एक कक्ष में बंद कर लिया। उन्होंने कहा— “जब तक मैं स्वयं बाहर न आऊँ, तब तक कोई भी द्वार न खोले। यदि किसी ने बीच में द्वार खोला, तो मेरा कार्य वहीं समाप्त हो जाएगा।” कुछ दिनों तक भीतर से लकड़ी काटने और औजारों की आवाज़ आती रही। फिर अचानक एक दिन सब कुछ शांत हो गया। न कोई आवाज़, न कोई हलचल। राजा चिंतित हुए, परंतु उन्हें शर्त याद थी। किन्तु रानी गुंडिचा (कुछ परम्पराओं में अन्य नाम भी मिलते हैं) अत्यंत व्याकुल हो उठीं। उन्हें लगा कि कहीं वृद्ध बढ़ई की मृत्यु तो नहीं हो गई। उन्होंने राजा से कहा— “यदि भीतर कोई अनहोनी हो गई हो और हम केवल शर्त के कारण प्रतीक्षा करते रहें, तो यह अनुचित होगा।” राजा धर्मसंकट में पड़ गए। एक ओर भगवान की आज्ञा, दूसरी ओर मानवीय चिंता। अंततः उन्होंने द्वार खुलवाने का निर्णय लिया।
अधूरी प्रतीत होने वाली मूर्तियाँ
जैसे ही द्वार खोला गया, वृद्ध बढ़ई कहीं दिखाई नहीं दिए। कक्ष के भीतर तीन दिव्य विग्रह स्थापित थे—
- भगवान जगन्नाथ
- भगवान बलभद्र
- देवी सुभद्रा
किन्तु उनकी मूर्तियाँ सामान्य प्रतिमाओं की भाँति पूर्ण नहीं थीं। उनके हाथ-पाँव पूर्ण विकसित नहीं थे। राजा अत्यंत दुखी हुए। उन्हें लगा कि उनकी अधीरता के कारण भगवान की मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। तभी दिव्य आकाशवाणी हुई— “हे राजन! शोक मत करो। यही मेरा इच्छित स्वरूप है। मैं इसी रूप में युगों-युगों तक भक्तों का कल्याण करूँगा।”
राजा समझ गए कि ईश्वर की इच्छा मनुष्य की कल्पना से कहीं अधिक गूढ़ होती है।
अधूरी मूर्तियों का आध्यात्मिक रहस्य
भगवान जगन्नाथ की अधूरी प्रतीत होने वाली मूर्तियाँ वास्तव में अपूर्णता का प्रतीक नहीं हैं। आचार्यों ने इनके अनेक आध्यात्मिक अर्थ बताए हैं—
- पहला, भगवान किसी एक सीमित शारीरिक सौन्दर्य में बंधे नहीं हैं। उनका स्वरूप अनन्त है।
- दूसरा, उनके विशाल नेत्र यह संदेश देते हैं कि वे सम्पूर्ण जगत पर समान दृष्टि रखते हैं।
- तीसरा, उनके छोटे हाथ यह संकेत करते हैं कि भगवान बिना बाहरी प्रदर्शन के भी सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं।
- चौथा, यह स्वरूप बताता है कि ईश्वर को बाहरी रूप से नहीं, बल्कि हृदय की भक्ति से पहचाना जाता है।
- पाँचवाँ, कुछ वैष्णव परम्पराओं के अनुसार यह वही भावमय स्वरूप है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण राधा और वृन्दावनवासियों के प्रेम का स्मरण करते हुए दिव्य प्रेमानन्द में निमग्न हो जाते हैं।
ब्रह्मा द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा
पुराणों के अनुसार, इसके पश्चात् सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने स्वयं इन दिव्य विग्रहों की प्राण-प्रतिष्ठा की। उस दिन से भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा उसी स्वरूप में नीलाचल (वर्तमान पुरी) में विराजमान हैं और करोड़ों भक्तों को दर्शन देते आ रहे हैं। इसी घटना को श्री जगन्नाथ परम्परा का वास्तविक प्रारम्भ माना जाता है।
इस कथा का आध्यात्मिक संदेश
राजा इन्द्रद्युम्न की कथा केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक प्रसंग नहीं है। यह मानव जीवन की आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक भी है।
- विश्ववसु हमें सिखाते हैं कि निष्कपट प्रेम ही सर्वोच्च पूजा है।
- विद्यापति बताते हैं कि भक्ति के साथ विवेक भी आवश्यक है।
- राजा इन्द्रद्युम्न यह प्रेरणा देते हैं कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए धैर्य, तपस्या और समर्पण अनिवार्य हैं।
- विश्वकर्मा का रहस्यमय रूप हमें स्मरण कराता है कि ईश्वर की लीला मनुष्य की बुद्धि से परे है।
- और भगवान जगन्नाथ का स्वरूप यह संदेश देता है कि परमात्मा किसी एक रूप, जाति, वर्ग या सीमा में बंधे नहीं हैं। वे वास्तव में “जगन्नाथ” हैं—समस्त जगत के नाथ।
भाग–2C : क्या श्री जगन्नाथ की कथा केवल आस्था है या इसके ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय प्रमाण भी हैं?
जब भी श्री जगन्नाथ, नीलमाधव या रथ यात्रा की कथा का उल्लेख होता है, तब अनेक लोगों के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है— यह केवल एक पौराणिक कथा है, या इसके समर्थन में शास्त्रीय और ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं?
इस प्रश्न का उत्तर सरल शब्दों में “हाँ” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता। इसका कारण यह है कि श्री जगन्नाथ परम्परा केवल इतिहास या केवल धर्म का विषय नहीं है, बल्कि यह आस्था, पुराण, स्थानीय जनश्रुति, राजवंशीय अभिलेख, स्थापत्य, पुरातत्व और जीवित परम्परा—इन सभी का अद्भुत संगम है। इसलिए किसी भी गंभीर अध्ययन में इन सभी पक्षों को साथ लेकर देखना आवश्यक है।
शास्त्रीय प्रमाण : पुराणों में श्री जगन्नाथ
श्री जगन्नाथ की महिमा का सबसे प्राचीन और विस्तृत वर्णन अनेक पुराणों में प्राप्त होता है। विशेष रूप से स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड में नीलाचल, नीलमाधव, राजा इन्द्रद्युम्न, विश्ववसु, विद्यापति तथा भगवान के दारु-विग्रह की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। यही ग्रंथ जगन्नाथ परम्परा का प्रमुख शास्त्रीय आधार माना जाता है।
इसके अतिरिक्त ब्रह्म पुराण में पुरुषोत्तम क्षेत्र (वर्तमान पुरी) की महिमा का उल्लेख है। इसमें इस क्षेत्र को भगवान विष्णु का परम पवित्र धाम बताया गया है, जहाँ दर्शन और उपासना से महान आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।
नारद पुराण तथा पद्म पुराण में भी पुरुषोत्तम क्षेत्र और भगवान विष्णु के इस विशेष स्वरूप की महिमा का वर्णन मिलता है। यद्यपि सभी ग्रंथ एक जैसे शब्दों में कथा प्रस्तुत नहीं करते, फिर भी उनका मूल संदेश समान है—पूर्वी समुद्र तट पर स्थित यह क्षेत्र भगवान विष्णु की विशेष कृपा से पवित्र हुआ। इन शास्त्रीय स्रोतों से स्पष्ट होता है कि श्री जगन्नाथ परम्परा का आधार केवल लोकविश्वास नहीं, बल्कि प्राचीन धार्मिक साहित्य में भी विद्यमान है।
क्या नीलमाधव और जगन्नाथ एक ही हैं?
विद्वानों का मत है कि नीलमाधव और श्री जगन्नाथ के संबंध को समझना इस परम्परा की कुंजी है। शास्त्रीय परम्परा के अनुसार पहले भगवान नीलमाधव की पूजा होती थी। बाद में उनके अन्तर्धान के पश्चात् भगवान के आदेश से दिव्य दारु (पवित्र काष्ठ) से वर्तमान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रहों की स्थापना हुई। अर्थात् भगवान बदले नहीं, बल्कि उनकी उपासना का स्वरूप परिवर्तित हुआ। इसी कारण अनेक आचार्य नीलमाधव को श्री जगन्नाथ का पूर्वरूप मानते हैं।
स्थानीय जनजातीय परम्पराओं का योगदान
श्री जगन्नाथ परम्परा की सबसे अद्भुत विशेषताओं में से एक यह है कि इसमें जनजातीय संस्कृति और वैदिक परम्परा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। विश्ववसु शबर समुदाय से थे। अनेक इतिहासकारों का मत है कि प्राचीन काल में ओडिशा के वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय भगवान के किसी विशेष काष्ठ-विग्रह की पूजा करते थे। समय के साथ वैष्णव परम्परा और स्थानीय श्रद्धा का ऐसा समन्वय हुआ कि वही परम्परा आगे चलकर श्री जगन्नाथ उपासना के रूप में विकसित हुई। इसी कारण आज भी श्री जगन्नाथ मंदिर की कई प्रमुख सेवाओं में दैतापति सेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। परम्परा के अनुसार वे स्वयं को विश्ववसु की वंशपरम्परा से जोड़ते हैं। यह परम्परा इस बात का जीवंत प्रतीक है कि भगवान की कृपा समाज के प्रत्येक वर्ग पर समान रूप से रहती है।
इतिहास क्या कहता है?
इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान भव्य श्री जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के महान शासक अनन्तवर्मन चोडगंग
देव द्वारा प्रारम्भ कराया गया। बाद में उनके उत्तराधिकारियों, विशेषकर अनंगभीम देव, ने मंदिर के निर्माण और विस्तार को आगे बढ़ाया। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। इतिहास मंदिर के निर्माण का उल्लेख करता है, न कि भगवान की उपासना की शुरुआत का।
अर्थात् यह संभव है कि भगवान की पूजा उससे कई शताब्दियों पहले से चली आ रही हो और बाद में उसके लिए वर्तमान विशाल मंदिर का निर्माण कराया गया हो। यही कारण है कि इतिहास और परम्परा को परस्पर विरोधी मानना उचित नहीं है। दोनों अलग-अलग प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
क्या पुरातात्त्विक प्रमाण उपलब्ध हैं?
पुरी और उसके आसपास के क्षेत्रों से विभिन्न कालों के शिलालेख, ताम्रपत्र, मूर्तिकला और स्थापत्य अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र रहा है। हालाँकि आज तक ऐसा कोई पुरातात्त्विक प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है जो सीधे राजा इन्द्रद्युम्न या नीलमाधव की कथा की प्रत्येक घटना की पुष्टि कर दे, परन्तु उपलब्ध अभिलेख यह अवश्य दर्शाते हैं कि पुरुषोत्तम क्षेत्र की ख्याति मध्यकाल से बहुत पहले स्थापित हो चुकी थी।
इसीलिए इतिहासकार उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अध्ययन करते हैं, जबकि धार्मिक परम्परा अपने शास्त्रीय स्रोतों और जीवित परम्पराओं पर आधारित रहती है।
दारु-विग्रह की परम्परा : विश्व में अद्वितीय
विश्व के अधिकांश प्राचीन मंदिरों में पत्थर या धातु की मूर्तियाँ स्थापित हैं, किन्तु श्री जगन्नाथ की प्रतिमाएँ पवित्र काष्ठ (दारु) से निर्मित होती हैं। और भी आश्चर्य की बात यह है कि निश्चित समय के अंतराल पर नवकलेवर की परम्परा के अंतर्गत भगवान के नए विग्रह बनाए जाते हैं। पुराने विग्रहों से ब्रह्म-तत्त्व को अत्यंत गोपनीय विधि से नए विग्रहों में स्थापित किया जाता है। यह परम्परा संसार के धार्मिक इतिहास में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है और श्री जगन्नाथ परम्परा की विशिष्ट पहचान है।
क्या सभी विद्वानों की एक ही राय है?
नहीं।
धर्मशास्त्र, इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक अध्ययन के विद्वान इस विषय को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।
- धर्मशास्त्र के आचार्य पुराणों और परम्पराओं को मुख्य आधार मानते हैं।
- इतिहासकार शिलालेखों, अभिलेखों और तिथियों के आधार पर अध्ययन करते हैं।
- पुरातत्वविद् भौतिक साक्ष्यों का विश्लेषण करते हैं।
- सांस्कृतिक शोधकर्ता इसे भारतीय सभ्यता के विभिन्न समुदायों के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण मानते हैं।
इन सभी दृष्टिकोणों का सम्मान करते हुए अध्ययन करने से विषय की समझ और भी व्यापक हो जाती है।
आस्था और इतिहास का सुंदर संगम
श्री जगन्नाथ परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ आस्था और इतिहास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक दिखाई देते हैं। एक ओर पुराण भगवान की दिव्य लीला का वर्णन करते हैं, तो दूसरी ओर इतिहास मंदिर के विकास, राजवंशों के संरक्षण और सांस्कृतिक विस्तार की जानकारी देता है। इसी समन्वय ने श्री जगन्नाथ को केवल एक मंदिर के देवता नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, समावेशी आध्यात्मिकता और लोककल्याण के वैश्विक प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
यदि श्री जगन्नाथ परम्परा को केवल इतिहास की दृष्टि से देखा जाए, तो उसकी आध्यात्मिक गहराई अधूरी रह जाएगी। और यदि केवल आस्था की दृष्टि से देखा जाए, तो उसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विकास की समृद्ध यात्रा छूट जाएगी। इसलिए उचित दृष्टिकोण यह है कि हम शास्त्र, इतिहास, पुरातत्व और जीवित परम्परा—चारों को साथ लेकर समझें।
यही संतुलित दृष्टि हमें यह अनुभव कराती है कि श्री जगन्नाथ केवल एक देवप्रतिमा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती हुई भारतीय सभ्यता, समन्वय, भक्ति और सांस्कृतिक चेतना के सजीव प्रतीक हैं।
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